अभिनेत्री बचपन में ऐसी दिखती , बुढ़ापे में कैसी दिखती ?

                   हिंदी सिनेमा प्रेमी हमेशा ही अपने चहेते कलाकारों की निजी जिंदगी में झाँकने को काफी उत्सुक रहते है। ऐसे कलाकारों के गॉसिप, फिल्मों में डेब्यू कब किया है, ऐसे अनेक प्रश्नो के साथ वे बचपन में कैसे दिखते होंगे ? इस तरह की उधेड़बुन में रहते है। 

                   सिनेमा प्रेमियों की इस उत्सुकता को थामे हम इस पोस्ट में बॉलीवुड के हिंदी सिनेमा की पुरानी अभिनेत्रियों से लेकर नए युग की नई अभिनेत्रियों के बचपन की तस्वीरों के साथ उनकी पहली फिल्म से लेकर उनके परिवार में झाँकने का प्रयास कर रहे है।  

मीना कुमारी : -      

                                                                               

  अभिनेत्री मीना  कुमारी  बचपन में कैसी दिखती थी और लोकप्रिय अभिनेत्री तक की तस्वीर
 

        भारतीय हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन के नाम से लोकप्रिय अभिनेत्री एवं कवियत्री मीणा कुमारी को खासकर दुःखान्त फिल्मों में इनकी यादगार भूमिकाओं के लिए आज भी याद किया जाता है। 

        मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1933 को मुंबई स्थित ' मीठावाला चाल ' में हुआ था। उनका असली नाम महजबीं बानो था। पारसी रंगमंच के एक कलाकार अली बक्श उनके पिता थे। मीना कुमारी की माता प्रभावती देवी थी जिन्होंने अपना नाम बदलकर इकबाल बानो रखा था। उनकी माता भी एक मशहूर नृत्यांगना थी।

         1939 में मीना कुमारी निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म " लेदरफेस " में एक बाल कलाकार के रूप में बेबी महजबीं के नाम से स्क्रीन पर नजर आयी थी। निर्देशक विजय भट्ट ने ही महजबीं का नाम मीना कुमारी रखा था। 

            अभिनेत्री मीना कुमारी केवल ट्रेजेडी क्वीन ही नहीं थी, बल्कि एक अच्छी कवियत्री के साथ संगीतकार भी थी। उन्होंने फिल्म " शाही लुटेरे " को संगीत भी दिया था।

         उनकी कुछ फिल्मों में फिल्म " एक ही भूल " [1940], फिल्म " कसौटी " [1941], फिल्म " पिया घर आजा  " [1948], फिल्म " श्री गणेश महिमा " [1949], फिल्म " बैजू बावरा " [1952], फिल्म दो भीगा जमीन " [1953], फिल्म " बंदिश " [1955], फिल्म " हलाकू " [1956], फिल्म " दिल अपना और प्रीत परायी " [1960], फिल्म " साहिब बीबी और गुलाम " [1962], फिल्म  " चित्रलेखा" [1964] तथा अन्य सदाबहार फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया है। 

निधन : - उनकी चर्चित फिल्म " पाकीजा " रिलीज़ होने के तीन हफ्ते पश्चात 31 मार्च 1972 को 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली।        

सायरा बानो : -                                                                               

चढ़ता सूरज ढलती शाम तक जैसे अभिनेत्री सायरा बानो

                हिन्दी सिनेमा के स्वर्ण युग की अग्रणी अभिनेत्रियों में से एक अभिनेत्री सायरा बानो के भारतीय हिन्दी सिनेमा में योगदान से उन्होंने अपनी प्रशंसा और पहचान बनायीं है।

              1960 और 1970 के दशक के दौरान, अभिनेत्री सायरा बानो कई सफल फ़िल्मों में नज़र आयी। उन्होंने अक्सर ऐसी भूमिकाएँ निभाई जो अभिनेत्री के रूप में उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है। सायरा बानो की कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में आपको याद होंगी जैसे-फ़िल्म "शादी" [1962] , फ़िल्म "आओ प्यार करें" [1964] , फ़िल्म "पड़ोसन" [1968] और फ़िल्म "पूरब और पश्चिम" [1970] शामिल है।

जन्म :-    सायरा बानो का जन्म 23 अगस्त 1944 को मसूरी में एक फ़िल्म उद्योग से जुड़े परिवार में हुआ। उनके पिता मियाँ एहसान-उल-हक़ फ़िल्म निर्माता थे और माता नसीम बानो अपने दौर की जानेमानी अभिनेत्री थी।सायरा बानो ने 1961 में निर्देशक सुबोध मुख़र्जी की फ़िल्म "जंगली" में अभिनेता शम्मी कपूर के साथ फ़िल्म में डेब्यू किया था। इस फ़िल्म को बड़ी सफलता मिली, जिससे सायरा बानो के करियर की शानदार शुरुवात माना जाता है। इसी फ़िल्म के कारण सायरा को अपने युग की अग्रणी अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है।

              उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर के दौरान राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र और शम्मी कपूर जैसे अभिनेताओं के साथ जोड़ी बनाई, इसे दर्शकों ने सराहा। सायरा बानो ने 1966 में हिन्दी सिनेमा के ट्रेजेडी किंग मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार से विवाह किया था। इनकी जोड़ी को बॉलीवुड की पसंददीदा अटूट जोड़ी माना जाता है।

शर्मीला टैगोर : -                                         

                                                                                    
अभिनेत्री शर्मीला टैगोर बचपन में। युवती के रूप में और बुढ़ापे की ओर अग्रसर होती तस्वीर।

        बॉलीवुड हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री शर्मीला टैगोर को  एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री माना जाता है। उन्होंने अपनी प्रतिभा, सुंदरता और बहुमुखी प्रतिभा से हिंदी फिल्म उद्योग में एक अमिट छाप छोड़ी है। 

        शर्मीला टैगोर का सबसे यादगार प्रदर्शन 1966 में निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म " आराधना " में रहा है। इस फिल्म में उन्होंने माँ और बेटी के रूप में दोहरी भूमिका [डबल रोल] निभाई थी। फिल्म के हिट गीतों और उनके किरदार ने उन्हें बॉलीवुड में मजबूत किया। 

जन्म और फिल्म में डेब्यू : - शर्मीला टैगोर का जन्म 8 दिसम्बर 1944 को उत्तर प्रदेश स्थित कानपुर में हुआ। वह एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार से है और प्रसिद्ध फिल्म निर्माता गीतिंद्रनाथ टैगोर की बेटी है। 

                 उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में फिल्म निर्माता सत्यजीत रे की बंगाली फिल्म " अपुर संसार " [1959] से अभिनय की शुरुवात की थी। जल्द ही, शर्मीला टैगोर ने हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया। 

विवाह : -    शर्मीला टैगोर ने 27 दिसम्बर 1968 को भोपाल के नवाब भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी से विवाह कर इस्लाम धर्म अपना लिया, अपना नाम बदलकर बेगम आयशा सुल्ताना रख लिया। उन्हें तीन संताने है। जिनमे पुत्र अभिनेता सैफ अली खान और दो पुत्रियां सबा अली खान और सोहा अली खान।  

             शर्मीला टैगोर 1960 और 1970 के दशक की सबसे अधिक मांगवाली अभिनेत्रियों की सूचि में अपना नाम दर्ज कराया। उस दौर में उनकी अलौकिक सुंदरता तथा अभिनय कौशल ने सारे भारत के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। 

              अपने पुरे फ़िल्मी करियर के दौरान शर्मीला टैगोर ने उल्लेखनीय बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है, ग्लैमरस भूमिकाओं से लेकर गहराई और भावनात्मक त्रीवता की आवश्यकता वाली भूमिकाओं के बीच बदलाव किया। उन्होंने चुनौत्तीपूर्ण किरदार निभाय जैसे फिल्म " मौसम ", " अमर प्रेम ", " चुपके चुपके " जैसी फिल्मों में एक अभिनेत्री के रूप में अपनी अभिनय की रेंज दिखाई है।     

अरुणा ईरानी : -            

                                                                                     
अभिनेत्री अरुणा ईरानी बचपन में युवा अवस्था में और बुढ़ापे की दहलीज पर की तस्वीरें

               बॉलीवुड हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री, निर्देशक तथा निर्माता अरुणा ईरानी ने बॉलीवुड में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अरुणा ईरानी ने काम उम्र में ही अपने करियर की शुरुवात की है। उन्होंने 1961 में निर्देशक नितिन बोस की फिल्म " गंगा जमुना " में एक बाल कलाकार के रूप में अपना फ़िल्मी करियर आरम्भ किया था।

          अरुणा ईरानी ने अपने दशकों के शानदार करियर के दौरान विभिन्न शैलियों में सहायक भूमिकाओं तक, अनेक प्रकार के किरदार निभाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। वे अपनी अभिनय क्षमता के लिए जानी जाती है। 

जन्म : -       अरुणा ईरानी का जन्म 3 मई 1946 को मुंबई में ईरानी पिता फरेदुन ईरानी और हिन्दू माता सगुणा के घर हुआ। उनके पिता की एक नाटक मंडली थी, जबकि माँ एक अभिनेत्री थी। 

                  अरुणा ईरानी को बचपन में पढ़ाई का शौक था और उनकी डॉक्टर बनने की इच्छा थी। परन्तु, उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। कारण उनके माता - पिता पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ थे। 

                  अरुणा ईरानी ने फिल्म " गंगा जमुना " के आलावा 1962 फिल्म " अनपढ़ " में अभिनेत्री माला सिन्हा के बचपन का किरदार निभाया था। इसके पश्चात उन्होंने अनेक फिल्मों में छोटे - मोटे किरदार निभाया है। अरुणा ईरानी की सबसे उल्लेखनीय फिल्मों में " कारवां " [1971], " बॉम्बे टू गोवा " [1972], " बेटा " [1992] तथा फिल्म " राजा हिंदुस्तानी "[1996] के आलावा कई अन्य फ़िल्में शामिल है।

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 रेखा  : -

अभिनेत्री रेखा बचपन में भोली -भाली सूरत , ग्लेमरस युवती और शो में जज के रूप में।

                             बॉलीवुड के हिन्दी सिनेमा जगत में अभिनेत्री रेखा एक प्रतिष्ठित शख्सियत है। वे अपनी बहुमुखी प्रतिभा, सुंदरता और रहस्यमय आभा के लिए प्रसिद्ध है। रेखा ने दशकों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रखा है। उन्होंने फ़िल्म उद्योग में अपनी यात्रा काम उम्र में शुरू की है।

निर्माता-निर्देशक मोहन सहगल की फ़िल्म "सावन भादों" [1970] में रेखा ने अभिनेता नवीन निश्चल के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। यह नवीन निश्चल-रेखा की जोड़ी की पहली फ़िल्म थी। फ़िल्म "सावन भादों" से उनके स्टारडम की ओर बढ़ने की शुरुवात हो चुकी थी। अपनी अभिनय क्षमता और मंत्रमुग्ध कर देनेवाली स्क्रीन उपस्थिति के कारण उन्हें पहचान मिल गई। इन वर्षों में रेखा ने नाटक, रोमांस और त्रासदी सहित विभिन्न किरदारों में यादगार प्रदर्शन किये है।

जन्म:-  रेखा का जन्म 10 अक्टूबर 1954 को मद्रास में रामासामी गणेशन और अभिनेत्री पुष्पावल्ली के घर हुआ। रेखा का वास्तविक नाम भानुरेखा गणेशन है, जबकि बॉलीवुड में उन्हें रेखा के नाम से जाना जाता है। रेखा ने अपना फ़िल्मी करियर तेलुगु फ़िल्म "इति गुट्टू" [1958] और फ़िल्म "रंगुला रत्नम" [1966] में एक बाल कलाकार के रूप की थी।


रेखा ने एक अभिनेत्री के रूप में कन्नड़ फ़िल्म "ऑपरेशन जैकपोट नल्ली सीआईडी 999" [1969] में डेब्यू किया। रेखा के करियर की बेहतरीन फ़िल्मों में 1978 में प्रकाश मेहरा की फ़िल्म "मुक़दर का सिकंदर" निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म "खूबसूरत" [1980] और फ़िल्म "उमरावजान" [1981] को कैसे भुलाया जा सकता है?

1980-1990 की दशक की हिन्दी सिनेमा की अग्रणी अभिनेत्रियों की पंक्ति में बैठ गई। बॉलीवुड के लगातार बदलते परिदृश्यों के बावजूद रेखा की विरासत क़ायम है।
  

 नीतू सिंह  : -           

बाल कलाकार बेबी सोनिया, हरनीत कौर उर्फ़ अभिनेत्री नीतू सिंह
                                                                                

                                                                         

                       बॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री नीतू सिंह ने अपना फ़िल्मी करियर की शुरुवात 1966 में निर्माता-निर्देशक देवेंद्र गोयल की कॉमेडी फ़िल्म "दसलाख" से और निर्देशक आर. कृष्णन की फ़िल्म "दो कलियाँ" [1968] में दोहरी भूमिका एक बाल कलाकार के रूप में की थी।

नीतू सिंह ने 1973 में निर्देशक के. शंकर की फ़िल्म "रिक्क्षावाला" में प्रमुख अभिनेत्री के रूप में स्क्रीन पर नज़र आयी। वैसे 1966 में ही उन्होंने राजेन्द्र कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी वाली फ़िल्म "सूरज" में भी बाल कलाकार की भूमिका में थी।

जन्म:-  नीतू सिंह का जन्म 8 जुलाई 1958 को दिल्ली में दर्शन सिंह और राजी कौर सिंह के पंजाबी सिख परिवार में हुआ। उनका जन्म नाम हरनीत कौर है, तो उस दौर में उन्हें बाल कलाकार के कारण बेबी सोनिया के नाम से भी जाना जाता था।

नीतू सिंह ने 1980 में बॉलीवुड के लोकप्रिय अभिनेता ऋषि कपूर से विवाह के पश्चात नीतू सिंह ने अभिनय से संन्यास लेने का निर्णय लिया था। हालांकि, उन्होंने 2009 में इम्तियाज़ अली की फ़िल्म "लव आज कल" से फ़िल्मों में वापसी की। वहीं से नीतू सिंह अपनी स्थायी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए कई फ़िल्मों में नज़र आयी।

ऋषि कपूर और नीतू सिंह की विवाह से पूर्व और विवाह के पश्चात की कुछ फ़िल्में "रफू चक्कर" [1975] , "खेल खेल में" [1975] , "कभी कभी" [1976] , "अमर अकबर एंथोनी" [1977] , "दुनिया मेरी जेब में" [1979] और फ़िल्म "झूठा कहीं का" [1979] उल्लेखनीय है। 

पद्मिनी कोल्हापुरे  : -                

अभिनेत्री बालिका से बुढ़ापे की दहलीज तक

                  अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे ने बॉलीवुड के हिन्दी सिनेमा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपने अभिनय करियर की शुरुवात एक बाल कलाकार के रूप में की थी। अपनी असाधारण प्रतिभा तथा मनमोहक प्रदर्शन से उन्होंने लोकप्रियता हासिल की है।

पद्मिनी कोल्हापुरे ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा और विभिन्न प्रकार के किरदारों को निभाने की क्षमता के लिए जानी जाती है। अपने लम्बे करियर के साथ, वे फ़िल्म उद्योग की एक सन्मानित अभिनेत्री बनी है।

जन्म :-  पद्मिनी कोल्हापुरे का जन्म 1 नवम्बर 1966 को मराठी कोंकणी परिवार में हुआ। उनके पिता पंढरीनाथ कोल्हापुरे पेशेवर संगीतकार थे। उनकी माता का नाम निरुपमा कोल्हापुरे था। पद्मिनी को दो बहने है। उनकी बड़ी बहन शिवांगी कोल्हापुरे भी अभिनेत्री थी, उनकी छोटी बहन तेजस्विनी कोल्हापुरे भी अभिनेत्री है।

पद्मिनी कोल्हापुरे ने फ़िल्म "इश्क़ इश्क़ इश्क़" [1974] में एक बाल कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुवात की थी, तब उनके अभिनय प्रदर्शन ने फ़िल्म निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया। जिससे फ़िल्म उद्योग में उन्हें अधिक अवसर मिले। इसके परिणाम स्वरुप उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई है। जैसे-फ़िल्म "ड्रीम गर्ल" [1977] , "सत्यम शिवम् सुंदरम" [1978] और "द बर्निंग ट्रैन" [1980] शामिल है।

1979 में गीतकार एवं निर्देशक गुलज़ार की फ़िल्म "सोलंवा सावन" में पद्मिनी ने एक वयस्क अभिनेत्री के रूप में शुरुवात की, जिसे उनके अभिनय के प्रदर्शन से प्रशंसा मिली और उन्हें बॉलीवुड में अग्रणी अभिनेत्री के रूप में यात्रा आरम्भ हुई। पद्मिनी कोल्हापुरे को वास्तविक सफलता शोमैन राजकपूर द्वारा 1982 में निर्देशित फ़िल्म "प्रेम रोग" से मिली। इस फ़िल्म में एक युवा विधवा के उनके किरदार ने पद्मिनी को स्टारडम तक पहुँचा दिया।

प्रीति ज़िंटा : -      

                                                                              
बचपन में कैसी दिखती थी प्रीती जिंटा

                प्रीति जिंटा बॉलीवुड फ़िल्म उद्योग की लोकप्रिय अभिनेत्री और एक उद्यमी है। हिन्दी फ़िल्मों के आलावा पंजाबी, तेलगु और अंग्रेज़ी फ़िल्मों में काम कर चुकी है। उन्होंने बॉलीवुड में सर्वाधिक कमाई करनेवाली दो फ़िल्मों में भूमिका निभाई है, जिनमे काल्पनिक विज्ञानं पर आधारित फ़िल्म "कोई मिल गया" और 2004 में फ़िल्म "वीर-जारा" शामिल है।

प्रीति जिंटा को 1998 में फ़िल्म "दिल से" और फ़िल्म "सोल्जर" के लिए फ़िल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ नै अदाकारा का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। प्रीति ने अनेक प्रकार के किरदार निभाय है। उनके अभिनय और उनके किरदारों के कारण उन्हें हिन्दी सिनेमा की अभिनेत्रियों की एक नई कल्पना को जन्म दिया है।

जन्म:-प्रीति जिंटा का जन्म 31 जनवरी 1975 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में दुर्गानंद जिंटा और निलप्रभा जिंटा के राजपूत परिवार में हुआ है। प्रीति जिंटा ने अभिनय में आने से पहले आपराधिक मनोविज्ञान में अपनी शिक्षा पूर्ण की थी।


अपने अभिनय कौशल के अतिरिक्त वे अपने परोपकारी प्रयासों और व्यावसायिक उद्यमों के लिए भी जानी जाती है। प्रीति जिंटा इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट टीम किंग्स इलेवन पंजाब की सह-मालिक है और विभिन्न सामजिक कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल रही है।

अपने पूरे फ़िल्मी करियर में प्रीति जिंटा ने हिन्दी सिनेमा में अपने योगदान के लिए कई पुरस्कार प्राप्त किये है, जिससे बॉलीवुड की सबसे पसंदीदा अभिनेत्रियों में से एक उन्हें माना जाता है।

काजोल  : -

                                                                    

काजोल बचपन में और अब प्रौढ़ काजोल
     

              काजोल एक प्रसिद्ध बॉलीवुड की अभिनेत्री है, जिन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा और मनमोहक अभिनय से फ़िल्मी दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। काजोल फ़िल्म उद्योग में गहरी जड़ें जमाये हुए परिवार से आती है।

अपने बहुमुखी अभिनय कौशल के लिए जाने जानेवाली विभिन्न प्रकार के किरदारों को खूबसूरती से निभाया है। सह-कलाकार शाहरुख़ खान के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री विशेष रूप से नज़र आती है।

दो दशकों से अधिक के अपने शानदार करियर के दौरान, काजोल को 6 फ़िल्मफेयर पुरस्कार सहित कई प्रशंसाएँ मिली है। जिस कारण वे बॉलीवुड के इतिहास में सबसे अधिक सम्मानित अभिनेत्रियों में से एक बन गई है।

जन्म :- अभिनेत्री काजोल का जन्म 5 अगस्त 1974 को मुंबई में हुआ। उनके पिता शोमू मुख़र्जी एक फ़िल्म निर्देशक एवं निर्माता है और उनकी माता तनूजा अपने दौर की लोकप्रिय अभिनेत्री थी। काजोल ने अपनी शिक्षा पंचगनी के प्रसिद्ध सेंट जोसेफस कान्वेंट स्कूल से पूर्ण की है।


काजोल ने 16 वर्ष की आयु में 1992 में फ़िल्म "बेखुदी" से फ़िल्मों में डेब्यू किया, परन्तु अभिनेता शाहरुख़ खान के साथ फ़िल्म "बाजीगर" [1993] काजोल की सफल भूमिका ने उन्हें व्यापक पहचान मिली।

1990 के दशक में सफल फ़िल्मों की जैसे बाढ़-सी आ गई थी, जिनमे फ़िल्म "दिल्लगी" [1994] , फ़िल्म "करण अर्जुन" [1995] , फ़िल्म "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" [1995] और "फ़िल्म कुछ-कुछ होता है" [1998] शामिल है। इन फ़िल्मों ने काजोल को फ़िल्म उद्योग में अग्रणी अभिनेत्रियों की पंक्ति में बिठा दिया।

विवाह:-काजोल ने 1994 में अपने करियर के पीक पर रहते हुए अभिनेता अजय देवगन संग विवाह किया। उनका मानना था कि करियर में करीब 8-9 वर्ष काम करने के पश्चात वर्कफ्रंट पर थोड़ी शान्ति मिलनी चाहिए।

अजय देवगन और काजोल की जोड़ी वाली कुछ फ़िल्में "प्यार तो होना ही था" [1998] , "इश्क़" [1997] , "दिल क्या करें" [1981] , "राजू चाचा" [2000] और यू मी और हम " [2007] शामिल है।

जयाप्रदा : -

बचपन की ललिता रानी और अब हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री जयाप्रदा
                                                                                 

         बॉलीवुड हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री जयाप्रदा एक प्रशंसित अभिनेत्री और पूर्व राजनीतिज्ञ है, जिन्होंने फिल्म उद्योग और राजनीति में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। उनकी प्रतिभा तथा समर्पण ने उन्हें 1980 और 1990 के दशक के दौरान हिंदी सिनेमा में सबसे अधिक मांग वाली अभिनेत्रियों में से एक बना दिया। जयाप्रदा ने अनेक फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्द्ध कर दिया था।  

          जयाप्रदा ने हिंदी, तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम और बंगाली सहित विभिन्न भाषाओँ की फिल्मों में अपने अभिनय का प्रदर्शन किया है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण उन्होंने रोमांटिक भूमिकाओं से लेकर जटिल किरदारों तक भूमिकाएं निभाई है। 

जन्म :   जयाप्रदा का जन्म 3 अप्रैल 1962 को तेलंगाना के राजमंड्री में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ।  उनका वास्तविक नाम ललिता रानी है। उनके पिता कृष्णा तेलगु फिल्मों के लिए फायनान्स किया करते थे। ललिता रानी की माता नीलवाणी ने उन्हें बचपन में ही नृत्य और संगीत की कक्षाओं में दाखिल कराया था।   

            चौदह वर्ष की आयु में जब पढ़ाई कर रही थी, तब जयाप्रदा ने स्कूल के वार्षिक समारोह में एक नृत्य का प्रदर्शन किया था। दर्शकों की भीड़ में एक फिल्म निर्देशक भी मौजूद थे। उन्हें बालिका जयाप्रदा का नृत्य पसंद आया और उन्होंने अपनी तेलगु फिल्म " भूमिकोसम " फिल्म में नृत्य प्रदर्शन की पेशकश की। उन्होंने जयाप्रदा को मात्र दस रूपए दिए। 

           इसके पश्चात जयाप्रदा ने तेलगु फिल्म " अंतुलेनि कथा ", फिल्म " सिरी सिरी मुव्वा " और फिल्म " सीता कल्याणम " जैसी फिल्मों में अभिनय कर वह एक बड़ी स्टार बन गयी। 

          1979 में निर्देशक के. विश्वनाथ ने फिल्म " सिरी सिरी मुव्वा " का हिंदी में रीमेक फिल्म " सरगम " बनायी, जिसमे लीड रोल में ऋषि कपूर थे। यह फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई। इस हिट फिल्म के बाद जयाप्रदा ने फिल्म " कामचोर "[1982], " शराबी " [1984], " संजोग " [1985] में अभिनय कर फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन अर्जित किये।

विवाह : 1986 में जयाप्रदा ने फिल्म निर्माता श्रीकांत नाहटा से विवाह किया, परन्तु उनका यह विवाह काफी विवादों में रहा। श्रीकांत नाहटा पहले से ही विवाहित थे, उनकी पहली पत्नी चंद्रा थी। आंध्रप्रदेश में तेलगु देशम पार्टी के संस्थापक एवं अभिनेता एन. टी. रामाराव के आग्रह पर जयाप्रदा 1994 में तेदेपा में शामिल हुई। इसके आलावा वे 2019 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई और सांसद बनी

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