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पार्श्वगायक मुकेश



                        हिंदी  सिनेमा जगत में वह आवाज़ जिसने एक अलग ही अपनी पहचान बनाई थी, जिसमे  एक दर्द एक अलग ही कशिश हुआ करती थी।  जाने -अनजाने उस आवाज की ओर खींचे चले जाते थे। जब कोई प्यार करनेवाले  प्रेमी एक  - दूसरे से बिछड़ रहे हो या उनकी जिंदिगी में किसी के प्यार का आगमन हुआ  हो, बस  यह  एक आवाज उनके प्यार का इजहार करने  में सबसे बड़ा सहारा बन जाती। हाँ, यह कशिश भरी आवाज उस ज़माने के मशहूर गायक श्री, मुकेशजी की हुआ करती थी। आज भी उनकी आवाज लाखों करोड़ों लोगों के दिलों में अमर है। वैसे मुकेशजी ने कई अभिनेताओं के गीतों को अपनी आवाज देकर उनकी लोकप्रियता बढ़ाई है। 
                 जब भी आर. के. स्टूडियो के बैनर से राजकपूर कोई फिल्म बनाते तो श्री. मुकेशजी को कैसे भूल पाते। राजकपूर की आवाज ही मुकेशजी थे। उस दौर में त्रिमूर्ति के नाम से राजकपूर , मुकेश और संगीतकार शंकर - जयकिशन की जोड़ी कामयाब समझी जाती थी। उन तीनो का गीत लोकप्रिय हुए बिना नहीं रहता। 
                 हिंदी सिनेमा में राजकपूर, मुकेशजी और संगीतकार शंकर - जयकिशन के दौर को बॉलीवुड का स्वर्ण युग समझा जाता था। इस दौर में इन त्रिमूर्ति कलाकारों ने फिल्मी दुनिया तथा संगीत प्रेमियों को कई अनमोल गीत प्रदान किये है, जैसे सं 1957 में बनी फिल्म '' आवारा '' का यह गीत '' आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ..... '' जैसे कई गीत लोकप्रिय बने है। 

मुकेशजी का जन्म : - 

               '' एक दिन बीत जाएगा माटी के मोल ''  के गायक श्री. मुकेशजी का पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था, परन्तु वे हिंदी सिनेमा जगत में मुकेश के नाम से ही जाने जाते थे। श्री. मुकेशजी का जन्म पंजाब के लुधियाना में 22 जुलाई 1933 को श्री. जोरावर चंद माथुर और चांदरानी के घर हुआ था। उन दिनों श्री. मुकेशजी की बड़ी बहन संगीत की शिक्षा लिया करती थी, तब मुकेशजी बड़े ध्यान से उन्हें सुना करते थे। यहीं से मुकेशजी ने श्री. मोतीलाल के घर संगीत की पारम्पारिक शिक्षा लेना आरम्भ कर दिया। वैसे तो मुकेशजी की ख्वाहिश हिंदी फिल्मों में अभिनेता बनने की थी।

फिल्मों की ओर : - 

          श्री.  मुकेशजी अपनी बहन के विवाह में गीत गा रहे थे, उनकी खूबसूरत आवाज सुनकर मोतीलाल उन्हें मुंबई अपने घर ले गए और उनका रहने का इंतजाम कर उनके रियाज़ का भी बंदोबस्त कर दिया था। 

                                                
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                          अभिनेत्री नलिनी जयवंत

         सं. 1941 में ही श्री. मुकेशजी को एक हिंदी फिल्म '' निर्दोष '' में मुख्य कलाकार का काम मिल गया जिसे वी. सी. देसाई ने निर्देशित किया था और इस फिल्म की मुख्य अभिनेत्री नलिनी जयवंत थी। इस फिल्म में मुकेशजी ने एक गीत भी गाया था जो इस प्रकार है -- '' दिल ही बुझा हो तो -----'

   

        सं. 1945 में श्री. मुकेशजी पार्श्वगायक के तौर पर फिल्म '' पहली नजर '' में मिला। इस फिल्म के अदाकार थे मोतीलाल। इस फिल्म को मजहर खान ने निर्देशित किया था। इसमें के अलावा उनकी अभिनेत्री वीणा थी। इस फिल्म में मोतीलाल पर फिल्माया गया गीत '' दिल जलता है तो जलने दे '' था, जब इस गीत को सुना जाता तो अनायास ही श्री. कुंदन लाल सहगल की याद आ जाती है। कहते है की श्री. मुकेशजी के आदर्श श्री. के. एल. सहगल ही थे। 
                                                          
                                                      
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फिल्म '' पहली नजर '' की अभिनेत्री वीणा

    चालीस के दशक में श्री. मुकेशजी की अपनी अलग ही गायन शैली बन चुकी थी। उन्होंने संगीतकार नौशाद के साथ मिलकर एक के बाद एक सुपरहिट गाने दिए है, जिनमे अधिकतर गाने दिलीप कुमार पर फिल्माए गए है जिनमे - ' तू कहे अगर ' फिल्म ''अंदाज़ 1949 '' ' गाये जा गीत मिलन के तू अपनी ' फिल्म '' मेला ''1948, ' यह प्यार की बातें, फिल्म '' अनोखी अदा '' 1948, ' हमआज कहीं दिल खो बैठे, फिल्म '' अंदाज़ '' 1949,इनके अतिरिक्त और भी कई गाने लोकप्रिय हो चुके है।
       श्री. मुकेशजी के गाने लोकप्रिय हो गए थे वे इस फिल्मी दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बना चुके थे, तब उनके मन में कुछऔर करने की लालसा हो रही थी। इसी के चलते उन्होंने फिल्म निर्माता बनने का ठान लिया और सं. 1951 में अर्जुन, शम्मी, मोती सागर एवं कनैह्यालाल चतुर्वेदी को लेकर फिल्म '' मल्हार '' बनाई। इस फिल्म को संगीतकार रोशन ने संगीत दिया था। इसके पश्चात सं. 1956 में फिल्म '' अनुराग ''  का निर्माण किया, जिसमे उन्होंने स्वयं मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म में उनके अतिरिक्त उषा किरण, शिवराज और टुन टुन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म का संगीत भी स्वयं मुकेशजी ने दिया था। इन फिल्मो के निर्माण से मिली असफलता के कारण उन्हें कष्टों का काफी सामना करना पड़ा था। 
         '' एक दिन बीत जाएगा माटी के मोल ''  के श्री. मुकेशजी का कैर्रिएर सं. 1960 के दशक में बहुत उंचाईयों पर था। उन्होंने इस दशक की शुरुवात में ही संगीतकार कल्याणजी - आनंदजी का स्वरबद्ध गीत '' डम -डम - डिगा डिगा,'' संगीतकार नौशाद का स्वरबद्ध गीत '' मेरा प्यार भी तू है,'' इनके आलावा संगीतकार एस. डी. बर्मन के गीतों को गाकर अपनी लोकप्रियता में चार चाँद लगा दिए। 
        उन्होंने फिल्म '' संगम '' 1964 में राजकपूर के लिए संगीतकार शंकर - जयकिशन के संगीत निर्देशन में गीत गाया। इसे फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। 
  पुरस्कार : - 
                       सं. 1974 में फिल्म '' रजनीगंधा '' का गीत ' कई बार यूँ ही देखा है -- ' के लिए बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ है। 

फिल्मफेयर अवार्ड :- 

 1]  फिल्म '' अनारी '' के ' सब कुछ सीखा हमने ' के लिए सं 1959 में         फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त। 
 2]  फिल्म  '' पहचान '' के ' सबसे बड़ा नादान ' के लिए सं. 1970 में            फिल्मफेयर पुरस्कार। 
 3]  फिल्म '' बे - ईमान '' के ' जय बोलो बे - ईमान की ' के लिए सं.               1972 में फिल्मफेयर पुरस्कार। 
 4]  फिल्म '' कभी - कभी '' के ' कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है '
      के सं. 1976 में फिल्मफेयर पुरस्कार मिला है। 
   इन पुरस्कारों के आलावा बंगाल फिल्म पत्रकार संघ द्वारा -
1]  1967, 2] 1968, और 3] 1970 में बेस्ट प्लेबैक सिंगर के पुरस्कार        प्राप्त हुए है। 
           
          ''  एक दिन बीत जाएगा माटी के मोल '' सं. 1976 में श्री. मुकेशजी अमेरिका के डेट्रॉइट मिचिगन के दौरे पर थे उस दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने दुनिया से अलविदा कर दिया। ऐसे महान कलाकार को अब सिर्फ यादों में ही संजोय रखा जा सकता है।