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स्वामी श्रद्धानन्द


                ''आज  तुम्हारी अपनी इन्द्रियां तुम्हारे अपने वश में नहीं। जब अपने मन पर तुम्हारा कुछ अधिकार नहीं , तब तुम दूसरों से क्या अधिकार प्राप्त कर सकते हो ? अधीकार ! अधिकार !! अधिकार !!! हाँ।  तुमने किस गिरे हुए शिक्षणालय में शिक्षा प्राप्त की थी ? क्या तुमने  कर्त्तव्य कभी नहीं सुना ? क्या तुम धर्म शब्द से अनभिज्ञ हो ?मातृभूमि  में अधिकार का क्या काम ? यहां धर्म ही आश्रय दे सकता है। अधिकार शब्द से सकामता की गंध आती है। विषय - वासना को अपने ह्रदय से नोचकर फेंक दो।  निष्काम भाव से  धर्म का सेवन करो। '' 
           सं. 1907 में राष्ट्रिय भावना से प्रेरित होकर स्वामी श्रद्धानंदजी ने '' सद्धर्म -प्रचारक '' में अधिकार और कर्तव्य की व्याख्या उक्ताशय के उदगारों से की थी। स्वामी श्रद्धानन्दजी उर्दू भाषा में पढ़े थे और इस भाषा के प्रभावशाली लेखक थे। जैसे ही उन्होंने धार्मिक एवं सार्वजनिक क्षेत्र में पदार्पण किया तब उन्होंने हिंदी में लिखना प्रारम्भ किया था।उन्होंने उर्दू का उपयोग केवल वकालत के काम तक ही सिमित रखा। 
           यहीं से '' सद्धर्म - प्रचारक '' उर्दू से हिंदी में प्रकाशित होने लगा। वे अपने साप्ताहिक आर्य समाजी उपदेशों तथा शिक्षा और राजनितिक सम्बन्धी लेख भी हिंदी में ही लिखने लगे। 
                
 '' सद्धर्म - प्रचारक '' उर्दू से हिंदी में प्रकाशित होने लगा।  वे अपने साप्ताहिक आर्य समाजी उपदेशों तथा शिक्षा और राजनितिक सम्बन्धी लेख भी हिंदी में ही लिखने लगे।

  जीवन परिचय :-
                          शिक्षाविद ,स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वतीजी का जन्म 22 फरवरी 1856 में पंजाब क्षेत्र के जालंधर स्थित तलवान ग्राम में एक खत्री परिवार में हुआ था। वैसे स्वामीजी का वास्तविक नाम मुंशीराम विज था। जब उन्होंने सन्यास लिया था तब उनका नाम स्वामी श्रद्धानन्द हो गया। 
             उनके पिता श्री. नानकचंद विज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविंस में एक पुलिस अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। श्री. मुशीरामजी के पिता का स्थानांतरण विभिन्न स्थानों पर होने के कारण उनकी आरंभिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी थी। 
              श्री.  मुंशीरामजी का आर्य समाज की ओर आकर्षित होने की घटना इस तरह थी - एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वतीजी वैदिक धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे थे। उस दौरान श्री. नानकचंदजी अपने पुत्र मुंशीरामजी  को साथ लेकर स्वामी दयानंदजी का प्रवचन सुनने पहुंचे थे। इससे पहले श्री. मुंशीरामजी  युवावस्था तक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। परन्तु स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी के आशीर्वाद ने श्री.मुंशीरामजी को दृढ़ विश्वासी और वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया था।  
                श्री. मुंशीरामजी का विवाह श्रीमती. शिवा देवी के साथ सम्पन हुआ था । जब श्री. मुंशीराम जी 35 वर्ष आयु के थे ,तभी उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। दुखी होकर उन्होंने सं. 1917 में संन्यास धारण कर लिया था और वहीं से वे स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए। 
                 आरम्भ से ही स्वामी श्रद्धानन्द जी की प्रवृत्ति धर्म की ओर थी। पहले कानपूर , काशी आदि नगरों में रह चुकने के कारण उनका झुकाव मंदिरों और सनातन रीति से पूजा - उपासना की ओर था। परन्तु पुजारी लोगों के पाखण्ड के कारण वह मंदिरों से विमुख हो गए थे। स्वामी दयानंदजी से मिलने के पश्चात उन्हें दृढ़ निश्चय हो गया था कि धर्म का सच्चा मार्ग वही है , जिसका प्रतिपादन स्वामीजी ने किया था।  
              जालंधर में वकालत करते समय उन्होंने काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की थी। अपनी वकालत की व्यस्तता के बावजूद आर्य समाज के कार्यों में बहुत सक्रीय रहा करते थे। 
               देश में जब कांग्रेस द्वारा आंदोलन आरम्भ होते ही स्वामी श्रद्धानन्द जी इस राजनैतिक आंदोलन में भी उत्साह और निर्भीकता से उतरे थे। सं. 1888 में पहली बार उनका राष्ट्रिय कांग्रेस से सम्बन्ध आया था। अपने परिश्रम के सहारे वे पंजाब तथा दिल्ली के प्रमुख राजनेताओं में गिने जाने लगे थे।
                स्वामी श्रद्धानंदजी ने प्रथम सत्याग्रह - आंदोलन में जिस निर्भिकता से दिल्ली की जनता का नेतृत्व किया था , उससे उनकी ख्याति और भी बढ़ी थी। इस सत्याग्रह में सम्मिलित होने की प्रेरणा उन्हें गांधीजी से मिली थी। 
              सं. 1901 में स्वामीजी ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने हरिद्वार के कांगड़ी गांव में '' गुरुकुल '' विद्यालय आरम्भ किया गया था। आज भी यह विद्यालय मौजूद है , जिसको हम '' गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय '' के नाम से जानते है। 
              जालियांवाला काण्ड के पश्चात कांग्रेस का 34 वां अधिवेशन दिसम्बर 1919 में अमृतसर में आयोजित किया गया था , जिसके स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में स्वामी श्रद्धानंदजी ने अपने भाषण के दौरान हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किये जाने का मार्ग प्रशस्त किया था। उस काल में कांग्रेस के मंच से हिंदी का यह पहला ऐतिहासिक भाषण था। 
               स्वामी श्रद्धानंदजी ने एक प्रकार से गांधीजी का भी ध्यान अपने हिंदी प्रेम तथा राष्ट्रभाषा के महत्त्व की ओर दिलाया था और गांधीजी के अंग्रेजी पत्र का उत्तर हिंदी में दिया था। इसी के फलस्वरूप गांधीजी ने उनके साथ के पत्र - व्यवहार , वार्तालाप इत्यादि में हिंदी का ही प्रयोग किया है। इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधीजी को '' महात्मा ''  की उपाधि देनेवाले स्वामी श्रद्धानंदजी ही थे। 
               रोलेट एक्ट के विरोध के दौरान और खिलाफत - आंदोलन को लेकर कांग्रेस तथा आर्य समाज में मतभेद और वैमनस्य सा हो गया था। उस परिस्थिति में स्वामीजी ने स्वतंत्र रूप से सामजिक ,विशेषकर हिन्दू - मुस्लिम एकता , राष्ट्रीय शिक्षा के विकास के लिए कार्य करने का निश्चय किया था तथा सं. 1921 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। 
             आखिरकार 23 दिसम्बर 1926 को उनके निवास स्थान पर अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी धर्म चर्चा के बहाने स्वामीजी के कक्ष में प्रवेश कर उनको गोली मारकर इस महान विभूति की हत्या कर दी थी।